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ऐसी ज्योत जलाऊंगा ॥
तम का साम्राज्य हटाकर , भाई -भाई में बैर मिटाकर
प्रेम का बिज लगाऊंगा , ऐसी ज्योत जलाऊंगा ||1||
हर कर कर्तब्य निष्ठ होगा , हर नर युधिस्ठिर होगा
नर नारी चलेंगे मिलकर ,केवल तब ही मै,
कामयाबी का गीत गाऊंगा ,ऐसी ज्योत जलाऊंगा ||2||
हर माँ सती सावित्री होगी ,
गएँ भी कामधेनु बनकर , अमृतधारा बरसाएंगी
फिर से रामराज्य लाऊंगा.. , ऐसी ज्योत जलाऊंगा ||३||
पशु -पच्छी और तरुवर मिलकर फिर से झूमेंगे ,
ॐ ॐ का स्वर चहुओर कोटि -कोटि में गूंजेगा
कान्हा बनकर तब मै ,प्रीत की बंसी बजाऊंगा
ऐसी ज्योत जलाऊंगा ||४||
तरणी कुमार
बहारों के मौसम में फूलों को झड़ते हुए देखा है
बुढापे में बाप की कमर टूटते हुए देखा है ||
जिंदगी को गर गम का सागर भी कहूँ ,
सागर को गागर में सिमटते हुए देखा है ||
लाख परेशान हो सच लेकिन ,
झूठ का पलडा झुकते हुए देखा है ||
बहारों के मौसम में फूलों को जड़ते हुए देखा है ||
लाख रुसवा करे जिंदगी लेकिन ।
हिम्मत वालों को हमने सीना ताने जीते हुए देखा है ||
बाघ और चिताओं के शिकारी को भी ,
सियारों का शिकार होते देखा है ।
बिषधर के मस्तक पर रहकर भी ,
मणि को हमने टिमटिमाते हुए देखा है ||
अभाओं की आंधी में भी मेहनत की लौ से जगमगते हुए देखा है ||
तरणी कुमार शर्मा तारीख २/०१/२००३
जाती हो दूर कहीं
नित दर्शन कैसे पाउँगा ..
रातों में जब भी निहारोगी आइना समझकर चाँद को
उसमे तुम मुझको देख लेना मै तुमको देख लूँगा || तरणी कुमार
तारीख २६/०४/२००४
हे भगवान ! तेरी इस बदलती दुनिया देखकर मुझे तो संदेह है ॥
कि अब कृष्ण जायेंगे बनवास और संग गोपियों के राम करेंगे महारास ।
फिल्मी गाने लिखेंगे तुलसी ..रावण धुन पर थिरकेंगे सूरदास ,
सीता को रावण जीत ले जाएगा और राम देखेंगे बैठे उदाश||१||
सुग्रीव को मारकर बाली किसकिन्धा में करेगा राज ,
लुट कर अबलाओं कि आबरू हर रावण करेगा नाज
राज्य के लिए भरत अब राम का बढ़ करवाएगा ,
कंश जैसे दुराचारी के हांथों हर कृष्ण मारा जाएगा ||२||
दुर्योधन की बंशी की धुन पर गोपियाँ मुग्ध हो जाएँगी ,
अमृतधारा बरसानेवाली गायें अब खरा पानी दे जाएँगी ,
माता की अमृतमयी आंचल अब बिश्पान करयेंगी ,
पिता की अश्मानी शाया अब बज्र का कहर ढायेंगी
पति अब पत्नी के घर में पत्नी की सेवा करेगा ॥
रोज शराबी पत्नी से हर पति पिता जाएगा ||३||
हे भगवान ... तरणी
१८/१२/२००१
घिरे जब जब संकट के बादल,चतुर्दिकों में दिखे शत्रुदल
खुशियाँ हो जायें दृष्टि से ओझल ,
और न आये को मार्ग नजर ,
घबरा न तू उन पलों में भी ,
लगा ऐसी हुंकार की जिससे गरज बादलों की हो जाएनिर्बल ...
चिर दल तुम उस अम्बर को बनकर तुफानो से भी सबल
संशय न कर ! है तुझमे अपर भुज बल ...
घिरे जब जब .....||१||
दृढ़ निश्चय से बढो पथ पर ।
काट डालो तुम उन बाधाओं को जो डाले तुम्हारी राहों में खलल ,
घोर तम में भी चम् चम् चमके ।
कीर्ति तुम्हारी जग में ऐसे माथे पर बिषधर के चमके है मणि जैसे
घिरे जब जब ...........||२||
कर डाल सफाया एक एक का ।
बनकर जैसे चक्र सुदर्शन
पर्वत भी पाताल में झांके -२
कदम अगर पड़ जाए उनपर
घिरे जब जब .....||३||
ऐसी तुम्हारी चल हो जिससे
देनी पड़े मार्ग सरिताओं को भी
दुस्त्दलों का दालान करो ऐसे की
महाकाल भी सरमाये तुमसे
घिरे जब जब ....||४||
बढो आगे तुम उस गति से तीव्र गति की हद हो ख़तम जहाँ से।
नही असंभव इस दुनिया में कुछ भी ।
अगर तुम्हारी चाह हो , यद् रहे लेकिन बस इतना ॥
पले न अहंकार कभी भी मन में...
और राम रहें सदा तेरे दिल में ॥
तरणी कुमार
राही देश के लिए चल, यारा देश के लिए मर
चले चल तुम उन राहों में जिन पर भगत राजगुरु चले
दमन कर बाधाओं का ऐसे झुक जायें कदम तले ,
राही देश के लिए चल यारा देश के लिया मर :1:
मौत एक देखि थी भगत की एक जीवन देखा था ,मरकर जीने वालों का ,
मरने वाले तू भी चुन ले मौत अपनी ,
चाहे मौत भगत सी या जीना बुजदिलों का
राही देश के लिए चल यारा देश के लिया मर :2:
एक अल्हड जवानी देखि मरते हुए दुल्हन के लिए
देखि एक मस्त जवानी दीवानी ,
चुमते मौत को वतन के लिए ,
मरने वाले तू भी चुन ले मौत अपनी .........
तरणी कुमार शर्मा

मधु ने किया मदपान बागों में कोयल ने कूक मारी शरद ओढ़कर पीले सरसों की चदरिया चढ़कर डोली में ली बिदाई , तरुअर तजकर चिर्वसन को ओढे तन पर नूतन चुनरिया , परिंदे होने लगे स्वदेश को रुखसत कोंपलों में कलियाँ मुस्करायी और तब जाने कब ......... चुपके चुपके छुपती छुपाती ॥ प्यारी बसंत ऋतू आई ... तरणी कुमार